anish गर्भवती महिला और शिशु के आरम्भिक वर्षों में बेहतर पोषण अत्यधिक महत्त्वपूर्ण : सीडीपीओ - . "body"

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गर्भवती महिला और शिशु के आरम्भिक वर्षों में बेहतर पोषण अत्यधिक महत्त्वपूर्ण : सीडीपीओ



- सदर सीडीपीओ ने टास्क फोर्स की बैठक में आईएलए कांटेक्ट 18 मॉड्यूल पर की चर्चा

- माताओं व गर्भवतियों को बीमारियों के संक्रमण और बचाव की जानकारी देना अनिवार्य

बक्सर, 25 जनवरी | कुपोषण व मृत्यु से बचने के लिए बीमारियों से बचाव विषय पर सोमवार को सदर बाल परियोजना सभागार में टास्क फोर्स की बैठक का आयोजन हुआ। बैठक की अध्यक्षता बाल विकास परियोजना पदाधिकारी पुष्पा रानी ने की। इस दौरान इंक्रीमेंटल लर्निंग अप्रोच (आईएलए) कांटेक्ट 18 मॉड्यूल पर चर्चा की गई। बैठक में सीडीपीओ पुष्पा रानी ने बताया कुपोषण सभी उम्र के लोगों के स्वास्थ्य के लिए सही नहीं है लेकिन गर्भवती महिला और शिशु के आरम्भिक वर्षों में बेहतर पोषण अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है। बच्चे के मस्तिष्क और शारीरिक विकास के लिए आवश्यक है कि विटामिन ,  कैल्शियम, आयरन, वसा और कार्बोहाइड्रेट वाले पोषक तत्वों के साथ संतुलित आहार बच्चे और मां को दिया जाए। जब बच्चे को आवश्यक पोषक तत्व, खनिज और कैलोरी प्राप्त नहीं होते, जो बच्चे के अंगों के विकास में मदद करते हैं तब बच्चे का शारीरिक विकास अवरुद्ध हो जाता है। कुपोषण के कारण बच्चे के शारीरिक व मानसिक विकास में रुकावट ही नहीं बल्कि मानसिक विकलांगता, जी.आई. ट्रैक्ट संक्रमण, एनीमिया और यहां तक कि मृत्यु भी हो सकती है|



बीमारी के कारण तो कोई कुपोषित नहीं हुआ है :

सीडीपीओ पुष्पा रानी ने बैठक में शामिल सदस्यों को बताया कि प्रखंड में मौसम के अनुसार संभावित बीमारियों की जानकारी रखनी होगी। गृह भ्रमण के दौरान इन बातों का ध्यान रखना जरूरी है कि गांव के बच्चे इस मौसम से किन-किन बीमारियों से ग्रसित होते हैं व कितने बच्चे बीमार पड़े हैं। साथ ही, इसकी भी सूची बनानी अनिवार्य है कि गांव में बीमारियों के कारण तो कोई बच्चा कुपोषण का शिकार नहीं हुआ है। इसका भी ख्याल रखना होगा कि बच्चों को बीमारियों से बचाने के लिए अभिभावकों को जागरूक किया जाए। इसके लिए गृह-भ्रमण के दौरान माताओं को संक्रमित बीमारियों की जानकारी दी जाए। साथ ही, उन्हें संक्रमण को रोकने के प्रति जगरूक किया जा सके। माताओं को समझाना होगा की हमारे आसपास कितने प्रकार के कीटाणु होते हैं है और अलग-अलग कीटाणुओं से कौन कौन बीमारियां होती हैं। वहीं, परिवार के सदस्यों को हाथ धोने के प्रति जागरूक करना होगा। विशेषकर शौच के बाद, खाना बनाने के पहले, खाना खाने व शिशुओं को खिलाने के पूर्व, छीकने, नाक पोछने तथा खांसने के बाद हाथ धोने के फायदों के बारे में बताएं। 

समय पर कुपोषण की पहचान करना महत्त्वपूर्ण :

सीडीपीओ ने कहा कुपोषित बच्चे के सही निदान और सही समय पर कुपोषण की पहचान करना बहुत महत्त्वपूर्ण है। ताकि, कुपोषण से बच्चे पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों को रोका जा सके। साथ ही, समय रहते बेहतर इलाज किया जा सके। शरीर में पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्वों के स्तर को बनाए रखने के लिए संतुलित आहार लेना जरूरी है। शिशुओं और बच्चों में कुपोषण के संकेत और लक्षण बच्चे की पोषण सम्बन्धी कमी पर निर्भर करते हैं। कुपोषण के कुछ संकेतों और लक्षणों में शामिल हैः थकान और कमजोरी, चिड़चिड़ापन, खराब प्रतिरक्षा प्रणाली के कारण संक्रमण के प्रति संवेदनशीलता  बढ़ जाती है, सूखी और पपड़ीदार त्वचा, अवरुद्ध विकास, फूला हुआ पेट, घाव, संक्रमण और बीमारी से ठीक होने में लम्बा समय लगना, मांसपेशियों का कम होना, व्यावहारिक और बौद्धिक विकास का धीमा होना, मानसिक कार्यक्षमता में कमी और पाचन समस्याएं आदि।

गर्भवती महिला और शिशु के आरम्भिक वर्षों में बेहतर पोषण अत्यधिक महत्त्वपूर्ण : सीडीपीओ

गर्भवती महिला और शिशु के आरम्भिक वर्षों में बेहतर पोषण अत्यधिक महत्त्वपूर्ण : सीडीपीओ



- सदर सीडीपीओ ने टास्क फोर्स की बैठक में आईएलए कांटेक्ट 18 मॉड्यूल पर की चर्चा

- माताओं व गर्भवतियों को बीमारियों के संक्रमण और बचाव की जानकारी देना अनिवार्य

बक्सर, 25 जनवरी | कुपोषण व मृत्यु से बचने के लिए बीमारियों से बचाव विषय पर सोमवार को सदर बाल परियोजना सभागार में टास्क फोर्स की बैठक का आयोजन हुआ। बैठक की अध्यक्षता बाल विकास परियोजना पदाधिकारी पुष्पा रानी ने की। इस दौरान इंक्रीमेंटल लर्निंग अप्रोच (आईएलए) कांटेक्ट 18 मॉड्यूल पर चर्चा की गई। बैठक में सीडीपीओ पुष्पा रानी ने बताया कुपोषण सभी उम्र के लोगों के स्वास्थ्य के लिए सही नहीं है लेकिन गर्भवती महिला और शिशु के आरम्भिक वर्षों में बेहतर पोषण अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है। बच्चे के मस्तिष्क और शारीरिक विकास के लिए आवश्यक है कि विटामिन ,  कैल्शियम, आयरन, वसा और कार्बोहाइड्रेट वाले पोषक तत्वों के साथ संतुलित आहार बच्चे और मां को दिया जाए। जब बच्चे को आवश्यक पोषक तत्व, खनिज और कैलोरी प्राप्त नहीं होते, जो बच्चे के अंगों के विकास में मदद करते हैं तब बच्चे का शारीरिक विकास अवरुद्ध हो जाता है। कुपोषण के कारण बच्चे के शारीरिक व मानसिक विकास में रुकावट ही नहीं बल्कि मानसिक विकलांगता, जी.आई. ट्रैक्ट संक्रमण, एनीमिया और यहां तक कि मृत्यु भी हो सकती है|



बीमारी के कारण तो कोई कुपोषित नहीं हुआ है :

सीडीपीओ पुष्पा रानी ने बैठक में शामिल सदस्यों को बताया कि प्रखंड में मौसम के अनुसार संभावित बीमारियों की जानकारी रखनी होगी। गृह भ्रमण के दौरान इन बातों का ध्यान रखना जरूरी है कि गांव के बच्चे इस मौसम से किन-किन बीमारियों से ग्रसित होते हैं व कितने बच्चे बीमार पड़े हैं। साथ ही, इसकी भी सूची बनानी अनिवार्य है कि गांव में बीमारियों के कारण तो कोई बच्चा कुपोषण का शिकार नहीं हुआ है। इसका भी ख्याल रखना होगा कि बच्चों को बीमारियों से बचाने के लिए अभिभावकों को जागरूक किया जाए। इसके लिए गृह-भ्रमण के दौरान माताओं को संक्रमित बीमारियों की जानकारी दी जाए। साथ ही, उन्हें संक्रमण को रोकने के प्रति जगरूक किया जा सके। माताओं को समझाना होगा की हमारे आसपास कितने प्रकार के कीटाणु होते हैं है और अलग-अलग कीटाणुओं से कौन कौन बीमारियां होती हैं। वहीं, परिवार के सदस्यों को हाथ धोने के प्रति जागरूक करना होगा। विशेषकर शौच के बाद, खाना बनाने के पहले, खाना खाने व शिशुओं को खिलाने के पूर्व, छीकने, नाक पोछने तथा खांसने के बाद हाथ धोने के फायदों के बारे में बताएं। 

समय पर कुपोषण की पहचान करना महत्त्वपूर्ण :

सीडीपीओ ने कहा कुपोषित बच्चे के सही निदान और सही समय पर कुपोषण की पहचान करना बहुत महत्त्वपूर्ण है। ताकि, कुपोषण से बच्चे पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों को रोका जा सके। साथ ही, समय रहते बेहतर इलाज किया जा सके। शरीर में पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्वों के स्तर को बनाए रखने के लिए संतुलित आहार लेना जरूरी है। शिशुओं और बच्चों में कुपोषण के संकेत और लक्षण बच्चे की पोषण सम्बन्धी कमी पर निर्भर करते हैं। कुपोषण के कुछ संकेतों और लक्षणों में शामिल हैः थकान और कमजोरी, चिड़चिड़ापन, खराब प्रतिरक्षा प्रणाली के कारण संक्रमण के प्रति संवेदनशीलता  बढ़ जाती है, सूखी और पपड़ीदार त्वचा, अवरुद्ध विकास, फूला हुआ पेट, घाव, संक्रमण और बीमारी से ठीक होने में लम्बा समय लगना, मांसपेशियों का कम होना, व्यावहारिक और बौद्धिक विकास का धीमा होना, मानसिक कार्यक्षमता में कमी और पाचन समस्याएं आदि।