anish पानी पृथ्वी का खून है, इसे यूँ ही ना बहाएं। भविष्य में डिहाइड्रेशन से बचने के लिए आज से वाटर कंजर्वेशन करें। - . "body"

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 पानी पृथ्वी का खून है, इसे यूँ ही ना बहाएं।भविष्य में डिहाइड्रेशन से बचने के लिए आज से वाटर कंजर्वेशन करें।


By admin

M v online bihar news/मै डॉ. ममतामयी प्रियदर्शिनी आज जल दिवस पर कुछ जल पर चर्चा करने जा रही हु.

जल शुरू से मेरा बहुत पसंदीदा विषय रहा है. आज २२ मार्च  को वर्ल्ड water Day है. तो उस दिन पानी के बारे में खूब बाते करते हैं, उसका खूब महिमामंडन करते हैं पर अगर  हम जल की महिमा और उसको बचाने के लिए रोज जतन करें तो हमें  पानी की बात करने के लिए एक दिन निर्धारित करने की जरुरत महसूस नहीं होगी.  

मैं जल पर अपनी बात ईशोपनिषद एक श्लोक से रखती हूँ 



ईशावास्यं इदं सर्वं यत् किञ्च जगत्यां जगत ।

तेन त्यक्तेन भुञ्जिथाः मा गृधः कस्य स्विद् धनम् 

जड़-चेतन प्राणियों वाली यह समस्त सृष्टि परमात्मा से व्याप्त है। मनुष्य इसके पदार्थों का आवश्यकतानुसार भोग करे, परंतु ‘यह सब मेरा नहीं है के भाव के साथ’ उनका संग्रह न करे। ये मैं पानी के सन्दर्भ में कह रही हूँ कि हम पानी का अवश्यतानुसार ही उपयोग करें.ये मेरा नहीं है इस भाव के साथ.

 जल को मैंने दो  तरह से define करूँगी:

आध्यात्मिक दृष्टि से  : जल को संस्कृत में आप कहते हैं..आ से आत्मा भी होती है और प से प्रलय भी होता है.जो आदि से अंत तक है वो जल है.

हमारे  पूर्वजो ने हमें पानी के बारे में क्या क्या सिखाया? उन्होंने सिखाया कि हम आचमन करते है, हम सूर्य की पूजा करते हैं तो जल चढाते हैं, हम पितरो का तर्पण करते हैं तो जल से करते हैं. हम वरुण एव की पूजा करते हैं वो जल है. हम हिन्दुओ में चरणामृत में जल देते हैं तो इसी बप्तिस्मा में जल देते हैं. हमारे यहाँ ऋषि किसी को शाप देते थे तो वो जल से . हम खाने का भोग लगते हैं तो त्वदीयं वस्तु गोविन्दम तुभ्यामेवे समर्पये से.


 

वो पानी को जीवित मानते थे. आज आपको हमको ये सच ना लगे पर जापान में एक बहुत बड़े जल वैज्ञानिक मसारू एमोतो ने फोटो खिंच के ये सिद्ध कर दिया कि हम पानी के सामने जैसा बोलेंगे, पानी उसी तरह से behave करेगा. उन्होंने एक गिलास में पानी लेकर उसे बोला की पानी आप हमारे लिए हीलिंग करने आये हो. तो पानी को जमाकर उसकी तस्वीर खिची तो वो फूल की तरह दिखा. और जब पानी के सामने हिटलर का नाम लिया गया तो पानी की तस्वीर बिलकुल बिखरी हुई आई. मेरे पास वो तस्वीरे हैं जो मैं आपको दिखा सकती हूँ.

हमारे शरीर में ७० परसेंट पानी है. अगर हमने अपने शरीर में पानी को ठीक कर लिया तो फिर बीमारी पास नहीं फटकेगी. 

वैज्ञानिक दृष्टि से : पानी की बात करें तो पानी एक अणुहाइड्रोजन और दो अणु ऑक्सीजन से मिल कर बना है. जल से ही जीवन है. हम  ये भी जानते हैं कि हमारे शरीर में  ७० % पानी है. इसीलिए अगर हमें स्वस्थ रहना है तो हमें साफ, स्वच्छ पानी पीना चाहिए. हमारे यहाँ निर्झर या झरने का पानी, झील का पानी बिलकुल healthy माना जाता था. लेकिन हम भगवान जो ठहरे, हमने ताल तलैया, सुखा दिए, पोखरों और झील के ऊपर building बना दी. और बच्चो के लिए जमीं धन संजो रहे हैं, और निर्जल संसार की स्थिति बना कर निर्धन बना रहे है.

orld’s population but only 4% of its usable freshwater, India has a scarcity of water.


आज जल संकट क्या है और उसके मुख्य कारण क्या हैं


जल ही जीवन का आधार है। जल के बिना जीवन की कल्पना बेईमानी है। पानी को किसी भी प्रयोगशाला में नहीं बनाया जा सकता। प्यास दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदी है और भारत के लिए तो और भी ज्यादा बड़ी।


१.कहा जाता है कि जल है तो कल है, पर जब  जल ही नहीं होगा तो सुनहरा कल कैसा? तभी हमारे पूर्वज कल कल बहती नदियों और झरनों को सुन्दर मानते थे. आज लगता है, उन्होंने ऐसा भी कुछ देखा होगा कि हमारी अगली पीढ़ी कही कल कल बहती नदियों को निर्जल न कर दे.  इधर कुछ ही सालों में हमने पानी के अकूत भंडारों को गंवा दिया और अब प्यास भर पानी के लिए सरकारों के मोहताज होते जा रहे हैं। 

२. विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अध्ययन के अनुसार दुनिया भर में 86 फीसदी से अधिक बीमारियों का कारण असुरक्षित व दूषित पेयजल है।वर्तमान में 1600 जलीय प्रजातियाँ जल प्रदूषण के कारण लुप्त होने के कगार पर हैं

3. जब से जल संकट के बारे में विश्व में चर्चा शुरू हुई तब से एक विचार प्रचलित हुआ है कि तीसरा विश्व युद्ध जल आपूर्ति के लिये होगा। वर्ष  1995 में विश्व बैंक के उपाध्यक्ष इस्माइलजी  ने कहा था कि ‘इस शताब्दी की लड़ाई तेल के लिये लड़ी गई है लेकिन अगली शताब्दी की लड़ाई जलापूर्ति के लिये लड़ी जाएगी।

४. पृथ्वी पर उपलब्ध कुल जल का केवल 2.07% ही शुद्ध जल है जिसे पीने योग्य माना जा सकता है। अगर विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानें तो दुनिया के दो अरब लोगों को पीने के लिये स्वच्छ जल नहीं मिल पाता है|

२. प्रकृति ने हमें पानी का अनमोल खजाना सौंपा था, लेकिन हम ही सदुपयोग नहीं  कर पाए. 

नलों में पानी क्या आया, हमने कुएं-इनार, पोखर सब  पाट दिया । तालाबों की जमीन पर अतिक्रमण कर लिया। नदियों का मीठा पानी पाइप लाइनों से शहरों तक भेजा। अब हर साल सूखा और जल संकट हमारी नियति बन गए हैं। 

3. इन नदियों का प्रदूषित जल न केवल जलीय जीवों के लिए प्राणघातक सिद्ध होगा,बल्कि यह भूजल के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश कर हमें अस्पताल की राह भी दिखाने वाली है।

3. पेड़ पौधो को काट कर घर बना डाले. अब जंगल कम होते जा रहे हैं, जबकि नदियों तक पानी पहुंचाने में जंगलों का बड़ा योगदान होता है। इसका असर वन्यजीवों पर भी पड़ रहा है। 

४. हम जमीं को पानी से ज्यादा महत्व दे रहे हैं. हम अपने बच्चो के लिए जमीं का धन तो सहेज कर जायेंगे पर पानी के लिए गरीब कर जायेंगे.

5.नदी,तालाब,कुंआ सहित चापानल के जलस्तर में बड़े अंतर का गिरावट देखा गया है

६. एक रिपोर्ट पढ़ रही थी, सौ साल के दौरान दुनिया ने जल प्रबंधन के मामले में दो बड़े बदलाव किए हैं। पहला- व्यक्ति और समुदायों ने जल प्रबंधन से हाथ खींच लिए और सरकार को यह जिम्मेवारी सौंप दी, जबकि 150 साल पहले जल को संरक्षित करना हर इन्सान की जिम्मेवारी थी

७. पहले लोग कहते थे, चुल्लू भर पानी में डूब मरो, तो शर्मनाक लगता था, और आज वो हकीकत होने वाली है. जब हम अपनी अगली पीढ़ी  को उसी चुल्लू भर पानी के लिए डूबने की तो बात दूर रही तड़पता देखेंगे.

हम सबने दक्षिण अफ्रीका की राजधानी केप टाउन के बारे में सुना ही होगा. वह जल संकट का ये हाल है  कि फिलहाल वहाँ रहने वाले लोग नहाते वक्त शरीर पर पड़ने वाले पानी को बचा लेते हैं  उसका शौचालय में इस्तेमाल कर रहे हैं। हाथ धोने के लिये पानी की जगह हैंड सेनिटाइजर प्रयोग में लाया जा रहा है।

वह समर्थ लोग वो देश छोड़ के बाहर जा रहे हैं ताकि वहाँ  पानी पर बोझ थोडा कम हो. इसीलिए वहां डेजीरो का कांसेप्ट है . पानी की सप्लाई रोकने के दिन को तकनीकी भाषा में डे जीरो कहा जाता है.


केप टाउन का जलसंकट भारत के लिये भी सबक है, क्योंकि यहाँ भी कई क्षेत्रों में हाल के वर्षों में सूखे का कहर बरपा है।यहाँ भी पानी की बेतहाशा बर्बादी हो रही है। अगर इसी तरह पानी की बर्बादी होती रही, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत में भी कई केप टाउन तैयार हो जाएँगे।

 

जल का संरक्षण हम कैसे कर बचा सकते हैं.? :

 

२. हम जैसे साक्षरता अभियान चलते हैं, हमें आपको, जल साक्षरता अभियान चलाना होगा , और ये एक दिन में नहीं होगा. जैसे जब हम विद्यालय में शिक्षा लेते हैं. वैसे ही हमारी किताबो का, हमारे घरो में शिक्षा का  एक चैप्टर जल के बारे में  जरुर होना चाहिए


२. हमारे आस पास जो लोकल पानी के पोखर , तालाब और पानी के सोर्स हैं वो या तो सुख रही हैं या हम  उसका अतिक्रमण कर रहे हैं., उसे रोकना होगा.

3. WHO के मुताबिक हमें अपनी जरुरतो के लिए २५ लीटर के करीब पानी चाहिए. बाकी पानी हमें पोछे और सफाई के लिए चाहिए जिसके लिए हमें बहुत अच्छी क्वालिटी का पानी होना जरुरी नहीं है. इसीलिए पानी की सप्लाई इसी तरह से घरो को होनी चाहिए.


3. हमारे यहाँ पानी जो पीपों से आता है उसमे कई जगह लीकेज हैं जिससे पानी waste होता हैं, हमें समय समय पर जैसे ३१ मार्च को फाइनेंसियल ऑडिट होता है वैसे water ऑडिट कराना होगा.

४. हमें अपनी सोच बदलिनी होगी. सप्लाई और ज्यादा पानी की सप्लाई को सुनिश्चित करने से अच्छा है कि लोगो को जरुरत भर पानी उसे करना सिखाये.


5. ये ऐसे हो सकता है की हर स्कूल बच्चो से जल सदुपयोग, जल संरक्षण पर पेंटिंग, भाषण प्रतियोगिता का आयोजन करवाए, जिससे बच्चे पानी की महत्ता के प्रति जागरूक हो सकें.


६. हमें भूमिगत जल को रिचार्ज की तरफ विशेष ध्यान देना होगा. इसके लिए बरसात का पानी जहा गिरता है , उसको वही संचित करने की व्यवस्था की जाए. बंगाल में जिसके घर तालाब होता था वो धनी  होता था, और आज हमारे देश में जिस क्षेत्र का जितना नगरीकरण हुआ है, चाहे वह एक भी पोखर तालाब ना हो, उसमे आबादी ज्यादा बढ़ रही है. एक रिपोर्ट के अनुसार भारत बारिश के पानी का सिर्फ ८ प्रतिशत बचाता है.जो पुरी दुनिया में सबसे कम है.

७. व्यक्तिगत तौर पर अगर हम किसी को पीने  का पानी देते हैं, तो उसे पूरेगिलास पानी देने के बजाय  आधा गिलास पानी दे. जिससे वो पूरा पानी पी जाए और पानी की बर्बादी कम हो.

८.लोगो को लगता है कि जल संरक्षण सिर्फ सरकार  का काम है तो ये गलत है. जल को बचने के लिए हमें खुद में छोटे छोटे बदलाव लाने होंगे.

१०. हमने अपने पारंपरिक व प्राकृतिक संसाधनों और पानी सहेजने की तकनीकों व तरीकों को भुला दिया है। समाज में पानी बचाने, सहेजने और उसकी समझ की कई ऐसी तकनीकें मौजूद रही हैं, जो ज्यादा बेहतर है|  पानी सहेजने के कुछ छोटे और खरे उपाय  जैसे स्थानीय पारंपरकि जलस्रोतों को संरिक्षत करने, बरसाती पानी का ज्यादा से ज्यादा उपयोग करने के बारे में सोचना होगा.मैं जब स्विट्ज़रलैंड  से पानी ट्रीटमेंट और स्टोरेज पर शिक्षा ले रही थी तो उन्होंने मोरिंगा और निर्मली के बीज  के बारे में बताया जो पानी को साफ कर सकता है. और हम अपनी उन तकनीक को भूल रहे हैं.

११. प्राचीन भारतीयों ने विभिन्न तरीकों से बारिश के पानी का संचयन करना सीखा। राजस्थान में, लोगों ने छतों से बहने वाले पानी को एकत्र किया और इसे अपने आंगन में बनी टंकियों में इकट्ठा किया। उत्तर बिहार और पश्चिम बंगाल में भी लोगों ने बाढ़ वाली नदियों के पानी का संचयन किया।


१२. शहरो में पानी को PURE करने के नाम पर अंधाधुंध R O लगाने को बंद करना होगा. RO मतलब होता है, TDS को कम करना.हमें वैसी  जगहों पर जहाँ टीडीएस ५०० से नीचे  हो, पानी के नार्मल purifier लगाने चाहिए 

जल संकट मॉनसून में देरी या बारिश की कमी नहीं है, जैसा कि भारत का मीडिया दावा कर रहा है. हक़ीक़त तो ये है कि बरसों से सरकार की अनदेखी, ग़लत आदतों को बढ़ावा देने और देश के जल संसाधनो के दुरुपयोग की वजह से मौजूदा जल संकट हमारे सामने खड़ा है.


१३. सिंचाई के लिए ड्रिप इरीगेशन जैसे तरीक़ों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, जिसमें फ़सलों पर पानी का छिड़काव होता है, न कि खेतों को पानी से लबालब भर दिया जाता है

5. मृदा में नमी को रोकने के लिए ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने होंगे.


पानी को अगर जीवित समझिये तो वो बहुत व्यथित है, हम अगर उसे तड़पायेंगे तो वो हमें बूंद बूंद को तरसा डालेगा. इसीलिए मेरी एक कविता की चार लाइन सुनाती हूँ.मैं तेरे आतंक से डर सा गया , धरती के गर्भ में छुपता गया,तुम ढुँढ़ मुझे ले आते हो, बोर-वेल से मुझे बुलाते हो .....मैं दर्द से अश्रु बहाता हूँ, जल खारा, तुम्हे पिलाता हूँ ,अब हाथ जोड विनती है मेरी , चंद सांसो की गिनती है मेरी ..मुझसे ही तुम्हारा सृजन हुआ ,अब जल-प्रलय की स्थिति बनाओ ना ,अगली पीढ़ी की नजरो में , शर्म से पानी-पानी हो जाओ ना ....जब होगा हमारा  मिशन SAVE जल, तभी होगा सुरक्षित हमारा कल 

पानी पृथ्वी का खून है, इसे यूँ ही ना बहाएं। भविष्य में डिहाइड्रेशन से बचने के लिए आज से वाटर कंजर्वेशन करें।

 पानी पृथ्वी का खून है, इसे यूँ ही ना बहाएं।भविष्य में डिहाइड्रेशन से बचने के लिए आज से वाटर कंजर्वेशन करें।


By admin

M v online bihar news/मै डॉ. ममतामयी प्रियदर्शिनी आज जल दिवस पर कुछ जल पर चर्चा करने जा रही हु.

जल शुरू से मेरा बहुत पसंदीदा विषय रहा है. आज २२ मार्च  को वर्ल्ड water Day है. तो उस दिन पानी के बारे में खूब बाते करते हैं, उसका खूब महिमामंडन करते हैं पर अगर  हम जल की महिमा और उसको बचाने के लिए रोज जतन करें तो हमें  पानी की बात करने के लिए एक दिन निर्धारित करने की जरुरत महसूस नहीं होगी.  

मैं जल पर अपनी बात ईशोपनिषद एक श्लोक से रखती हूँ 



ईशावास्यं इदं सर्वं यत् किञ्च जगत्यां जगत ।

तेन त्यक्तेन भुञ्जिथाः मा गृधः कस्य स्विद् धनम् 

जड़-चेतन प्राणियों वाली यह समस्त सृष्टि परमात्मा से व्याप्त है। मनुष्य इसके पदार्थों का आवश्यकतानुसार भोग करे, परंतु ‘यह सब मेरा नहीं है के भाव के साथ’ उनका संग्रह न करे। ये मैं पानी के सन्दर्भ में कह रही हूँ कि हम पानी का अवश्यतानुसार ही उपयोग करें.ये मेरा नहीं है इस भाव के साथ.

 जल को मैंने दो  तरह से define करूँगी:

आध्यात्मिक दृष्टि से  : जल को संस्कृत में आप कहते हैं..आ से आत्मा भी होती है और प से प्रलय भी होता है.जो आदि से अंत तक है वो जल है.

हमारे  पूर्वजो ने हमें पानी के बारे में क्या क्या सिखाया? उन्होंने सिखाया कि हम आचमन करते है, हम सूर्य की पूजा करते हैं तो जल चढाते हैं, हम पितरो का तर्पण करते हैं तो जल से करते हैं. हम वरुण एव की पूजा करते हैं वो जल है. हम हिन्दुओ में चरणामृत में जल देते हैं तो इसी बप्तिस्मा में जल देते हैं. हमारे यहाँ ऋषि किसी को शाप देते थे तो वो जल से . हम खाने का भोग लगते हैं तो त्वदीयं वस्तु गोविन्दम तुभ्यामेवे समर्पये से.


 

वो पानी को जीवित मानते थे. आज आपको हमको ये सच ना लगे पर जापान में एक बहुत बड़े जल वैज्ञानिक मसारू एमोतो ने फोटो खिंच के ये सिद्ध कर दिया कि हम पानी के सामने जैसा बोलेंगे, पानी उसी तरह से behave करेगा. उन्होंने एक गिलास में पानी लेकर उसे बोला की पानी आप हमारे लिए हीलिंग करने आये हो. तो पानी को जमाकर उसकी तस्वीर खिची तो वो फूल की तरह दिखा. और जब पानी के सामने हिटलर का नाम लिया गया तो पानी की तस्वीर बिलकुल बिखरी हुई आई. मेरे पास वो तस्वीरे हैं जो मैं आपको दिखा सकती हूँ.

हमारे शरीर में ७० परसेंट पानी है. अगर हमने अपने शरीर में पानी को ठीक कर लिया तो फिर बीमारी पास नहीं फटकेगी. 

वैज्ञानिक दृष्टि से : पानी की बात करें तो पानी एक अणुहाइड्रोजन और दो अणु ऑक्सीजन से मिल कर बना है. जल से ही जीवन है. हम  ये भी जानते हैं कि हमारे शरीर में  ७० % पानी है. इसीलिए अगर हमें स्वस्थ रहना है तो हमें साफ, स्वच्छ पानी पीना चाहिए. हमारे यहाँ निर्झर या झरने का पानी, झील का पानी बिलकुल healthy माना जाता था. लेकिन हम भगवान जो ठहरे, हमने ताल तलैया, सुखा दिए, पोखरों और झील के ऊपर building बना दी. और बच्चो के लिए जमीं धन संजो रहे हैं, और निर्जल संसार की स्थिति बना कर निर्धन बना रहे है.

orld’s population but only 4% of its usable freshwater, India has a scarcity of water.


आज जल संकट क्या है और उसके मुख्य कारण क्या हैं


जल ही जीवन का आधार है। जल के बिना जीवन की कल्पना बेईमानी है। पानी को किसी भी प्रयोगशाला में नहीं बनाया जा सकता। प्यास दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदी है और भारत के लिए तो और भी ज्यादा बड़ी।


१.कहा जाता है कि जल है तो कल है, पर जब  जल ही नहीं होगा तो सुनहरा कल कैसा? तभी हमारे पूर्वज कल कल बहती नदियों और झरनों को सुन्दर मानते थे. आज लगता है, उन्होंने ऐसा भी कुछ देखा होगा कि हमारी अगली पीढ़ी कही कल कल बहती नदियों को निर्जल न कर दे.  इधर कुछ ही सालों में हमने पानी के अकूत भंडारों को गंवा दिया और अब प्यास भर पानी के लिए सरकारों के मोहताज होते जा रहे हैं। 

२. विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अध्ययन के अनुसार दुनिया भर में 86 फीसदी से अधिक बीमारियों का कारण असुरक्षित व दूषित पेयजल है।वर्तमान में 1600 जलीय प्रजातियाँ जल प्रदूषण के कारण लुप्त होने के कगार पर हैं

3. जब से जल संकट के बारे में विश्व में चर्चा शुरू हुई तब से एक विचार प्रचलित हुआ है कि तीसरा विश्व युद्ध जल आपूर्ति के लिये होगा। वर्ष  1995 में विश्व बैंक के उपाध्यक्ष इस्माइलजी  ने कहा था कि ‘इस शताब्दी की लड़ाई तेल के लिये लड़ी गई है लेकिन अगली शताब्दी की लड़ाई जलापूर्ति के लिये लड़ी जाएगी।

४. पृथ्वी पर उपलब्ध कुल जल का केवल 2.07% ही शुद्ध जल है जिसे पीने योग्य माना जा सकता है। अगर विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानें तो दुनिया के दो अरब लोगों को पीने के लिये स्वच्छ जल नहीं मिल पाता है|

२. प्रकृति ने हमें पानी का अनमोल खजाना सौंपा था, लेकिन हम ही सदुपयोग नहीं  कर पाए. 

नलों में पानी क्या आया, हमने कुएं-इनार, पोखर सब  पाट दिया । तालाबों की जमीन पर अतिक्रमण कर लिया। नदियों का मीठा पानी पाइप लाइनों से शहरों तक भेजा। अब हर साल सूखा और जल संकट हमारी नियति बन गए हैं। 

3. इन नदियों का प्रदूषित जल न केवल जलीय जीवों के लिए प्राणघातक सिद्ध होगा,बल्कि यह भूजल के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश कर हमें अस्पताल की राह भी दिखाने वाली है।

3. पेड़ पौधो को काट कर घर बना डाले. अब जंगल कम होते जा रहे हैं, जबकि नदियों तक पानी पहुंचाने में जंगलों का बड़ा योगदान होता है। इसका असर वन्यजीवों पर भी पड़ रहा है। 

४. हम जमीं को पानी से ज्यादा महत्व दे रहे हैं. हम अपने बच्चो के लिए जमीं का धन तो सहेज कर जायेंगे पर पानी के लिए गरीब कर जायेंगे.

5.नदी,तालाब,कुंआ सहित चापानल के जलस्तर में बड़े अंतर का गिरावट देखा गया है

६. एक रिपोर्ट पढ़ रही थी, सौ साल के दौरान दुनिया ने जल प्रबंधन के मामले में दो बड़े बदलाव किए हैं। पहला- व्यक्ति और समुदायों ने जल प्रबंधन से हाथ खींच लिए और सरकार को यह जिम्मेवारी सौंप दी, जबकि 150 साल पहले जल को संरक्षित करना हर इन्सान की जिम्मेवारी थी

७. पहले लोग कहते थे, चुल्लू भर पानी में डूब मरो, तो शर्मनाक लगता था, और आज वो हकीकत होने वाली है. जब हम अपनी अगली पीढ़ी  को उसी चुल्लू भर पानी के लिए डूबने की तो बात दूर रही तड़पता देखेंगे.

हम सबने दक्षिण अफ्रीका की राजधानी केप टाउन के बारे में सुना ही होगा. वह जल संकट का ये हाल है  कि फिलहाल वहाँ रहने वाले लोग नहाते वक्त शरीर पर पड़ने वाले पानी को बचा लेते हैं  उसका शौचालय में इस्तेमाल कर रहे हैं। हाथ धोने के लिये पानी की जगह हैंड सेनिटाइजर प्रयोग में लाया जा रहा है।

वह समर्थ लोग वो देश छोड़ के बाहर जा रहे हैं ताकि वहाँ  पानी पर बोझ थोडा कम हो. इसीलिए वहां डेजीरो का कांसेप्ट है . पानी की सप्लाई रोकने के दिन को तकनीकी भाषा में डे जीरो कहा जाता है.


केप टाउन का जलसंकट भारत के लिये भी सबक है, क्योंकि यहाँ भी कई क्षेत्रों में हाल के वर्षों में सूखे का कहर बरपा है।यहाँ भी पानी की बेतहाशा बर्बादी हो रही है। अगर इसी तरह पानी की बर्बादी होती रही, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत में भी कई केप टाउन तैयार हो जाएँगे।

 

जल का संरक्षण हम कैसे कर बचा सकते हैं.? :

 

२. हम जैसे साक्षरता अभियान चलते हैं, हमें आपको, जल साक्षरता अभियान चलाना होगा , और ये एक दिन में नहीं होगा. जैसे जब हम विद्यालय में शिक्षा लेते हैं. वैसे ही हमारी किताबो का, हमारे घरो में शिक्षा का  एक चैप्टर जल के बारे में  जरुर होना चाहिए


२. हमारे आस पास जो लोकल पानी के पोखर , तालाब और पानी के सोर्स हैं वो या तो सुख रही हैं या हम  उसका अतिक्रमण कर रहे हैं., उसे रोकना होगा.

3. WHO के मुताबिक हमें अपनी जरुरतो के लिए २५ लीटर के करीब पानी चाहिए. बाकी पानी हमें पोछे और सफाई के लिए चाहिए जिसके लिए हमें बहुत अच्छी क्वालिटी का पानी होना जरुरी नहीं है. इसीलिए पानी की सप्लाई इसी तरह से घरो को होनी चाहिए.


3. हमारे यहाँ पानी जो पीपों से आता है उसमे कई जगह लीकेज हैं जिससे पानी waste होता हैं, हमें समय समय पर जैसे ३१ मार्च को फाइनेंसियल ऑडिट होता है वैसे water ऑडिट कराना होगा.

४. हमें अपनी सोच बदलिनी होगी. सप्लाई और ज्यादा पानी की सप्लाई को सुनिश्चित करने से अच्छा है कि लोगो को जरुरत भर पानी उसे करना सिखाये.


5. ये ऐसे हो सकता है की हर स्कूल बच्चो से जल सदुपयोग, जल संरक्षण पर पेंटिंग, भाषण प्रतियोगिता का आयोजन करवाए, जिससे बच्चे पानी की महत्ता के प्रति जागरूक हो सकें.


६. हमें भूमिगत जल को रिचार्ज की तरफ विशेष ध्यान देना होगा. इसके लिए बरसात का पानी जहा गिरता है , उसको वही संचित करने की व्यवस्था की जाए. बंगाल में जिसके घर तालाब होता था वो धनी  होता था, और आज हमारे देश में जिस क्षेत्र का जितना नगरीकरण हुआ है, चाहे वह एक भी पोखर तालाब ना हो, उसमे आबादी ज्यादा बढ़ रही है. एक रिपोर्ट के अनुसार भारत बारिश के पानी का सिर्फ ८ प्रतिशत बचाता है.जो पुरी दुनिया में सबसे कम है.

७. व्यक्तिगत तौर पर अगर हम किसी को पीने  का पानी देते हैं, तो उसे पूरेगिलास पानी देने के बजाय  आधा गिलास पानी दे. जिससे वो पूरा पानी पी जाए और पानी की बर्बादी कम हो.

८.लोगो को लगता है कि जल संरक्षण सिर्फ सरकार  का काम है तो ये गलत है. जल को बचने के लिए हमें खुद में छोटे छोटे बदलाव लाने होंगे.

१०. हमने अपने पारंपरिक व प्राकृतिक संसाधनों और पानी सहेजने की तकनीकों व तरीकों को भुला दिया है। समाज में पानी बचाने, सहेजने और उसकी समझ की कई ऐसी तकनीकें मौजूद रही हैं, जो ज्यादा बेहतर है|  पानी सहेजने के कुछ छोटे और खरे उपाय  जैसे स्थानीय पारंपरकि जलस्रोतों को संरिक्षत करने, बरसाती पानी का ज्यादा से ज्यादा उपयोग करने के बारे में सोचना होगा.मैं जब स्विट्ज़रलैंड  से पानी ट्रीटमेंट और स्टोरेज पर शिक्षा ले रही थी तो उन्होंने मोरिंगा और निर्मली के बीज  के बारे में बताया जो पानी को साफ कर सकता है. और हम अपनी उन तकनीक को भूल रहे हैं.

११. प्राचीन भारतीयों ने विभिन्न तरीकों से बारिश के पानी का संचयन करना सीखा। राजस्थान में, लोगों ने छतों से बहने वाले पानी को एकत्र किया और इसे अपने आंगन में बनी टंकियों में इकट्ठा किया। उत्तर बिहार और पश्चिम बंगाल में भी लोगों ने बाढ़ वाली नदियों के पानी का संचयन किया।


१२. शहरो में पानी को PURE करने के नाम पर अंधाधुंध R O लगाने को बंद करना होगा. RO मतलब होता है, TDS को कम करना.हमें वैसी  जगहों पर जहाँ टीडीएस ५०० से नीचे  हो, पानी के नार्मल purifier लगाने चाहिए 

जल संकट मॉनसून में देरी या बारिश की कमी नहीं है, जैसा कि भारत का मीडिया दावा कर रहा है. हक़ीक़त तो ये है कि बरसों से सरकार की अनदेखी, ग़लत आदतों को बढ़ावा देने और देश के जल संसाधनो के दुरुपयोग की वजह से मौजूदा जल संकट हमारे सामने खड़ा है.


१३. सिंचाई के लिए ड्रिप इरीगेशन जैसे तरीक़ों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, जिसमें फ़सलों पर पानी का छिड़काव होता है, न कि खेतों को पानी से लबालब भर दिया जाता है

5. मृदा में नमी को रोकने के लिए ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने होंगे.


पानी को अगर जीवित समझिये तो वो बहुत व्यथित है, हम अगर उसे तड़पायेंगे तो वो हमें बूंद बूंद को तरसा डालेगा. इसीलिए मेरी एक कविता की चार लाइन सुनाती हूँ.मैं तेरे आतंक से डर सा गया , धरती के गर्भ में छुपता गया,तुम ढुँढ़ मुझे ले आते हो, बोर-वेल से मुझे बुलाते हो .....मैं दर्द से अश्रु बहाता हूँ, जल खारा, तुम्हे पिलाता हूँ ,अब हाथ जोड विनती है मेरी , चंद सांसो की गिनती है मेरी ..मुझसे ही तुम्हारा सृजन हुआ ,अब जल-प्रलय की स्थिति बनाओ ना ,अगली पीढ़ी की नजरो में , शर्म से पानी-पानी हो जाओ ना ....जब होगा हमारा  मिशन SAVE जल, तभी होगा सुरक्षित हमारा कल