टीबी की बैक्टीरिया दिमाग को भी करते हैं प्रभावित, समय पर इलाज नहीं होने से बढ़ती है परेशानी
- टीबी के सही लक्षणों की जानकारी नहीं होने के कारण मरीजों का देर से शुरू होता है इलाज
- दिमागी टीबी में लापरवाही बरतना मरीज के लिए हो सकता है नुकसानदायक
By amit kumar
M v online bihar news/बक्सर, 04 मार्च | टीबी (ट्यूबर कलोसिस) एक बैक्टीरियल इन्फेक्शन है, जो सामान्यतः हमारे फेफड़ों को प्रभावित करती है। हालांकि, अब टीबी का पूरी तरह से इलाज संभव है। लेकिन, इसे नजरअंदाज करना लोगों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। अधिकांश लोग जानकारी के अभाव व लक्षणों की पहचान नहीं हो पाने से टीबी का इलाज समय पर शुरू नहीं करा पाते हैं। जिसके कारण उनकी स्थिति खराब होने लगती है। अमूमन लोगों को लगता है कि टीबी सिर्फ फेफड़े या हड्डियों में ही होती है, पर ऐसा नहीं है। यह सिर्फ फेफड़ों को ही नहीं हमारे दिमाग (ब्रेन टीबी) को भी प्रभावित कर सकती है।
जिला यक्ष्मा पदाधिकारी सह अपर मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. नरेश कुमार ने बताया दिमागी टीबी को चिकित्सकीय भाषा में ट्यूबरकुलर मैनेंजाइटिस (टीबीएम) कहते हैं। टीबी की बैक्टीरिया दिमाग के खास हिस्से में जगह बना लेता है। धीरे-धीरे वहां पर चकत्ता बन जाता है। इससे दिमाग की सूक्ष्म रक्त वाहिकाओं में रुकावट तक पैदा हो सकती है। जिसके कारण तेज सिरदर्द, गर्दन में झटका, धुंधला दिखाई देने के साथ थकान, उल्टी या असमंजस की स्थिति बने तो ये लक्षण दिमाग में टीबी के हो सकते हैं।
दिमाग के टीबी में लक्षणों की पहचान मुश्किल :
एसीएमओ डॉ. नरेश कुमार ने बताया दिमागी टीबी में लापरवाही बरतना नुकसानदायक हो सकता है। आमतौर पर इसके लक्षणों की पहचान शुरुआत में न होकर गंभीर अवस्था में हो पाती है। उन्होंने बताया कि सामान्यत: दिमाग के टीबी में लक्षणों की पहचान मुश्किल होती है। रोगी का इलाज न्यूरोलॉजिकल गड़बड़ी समझकर चलता रहता है। यही कारण है कि टीबी की पहचान गंभीर अवस्था में हो पाती है। दिमागी परेशानी से जुड़े अन्य लक्षणों के अलावा व्यक्ति को ध्यान केंद्रित करने में तकलीफ होना, हर बात पर विचार करने में जरूरत से ज्यादा समय लगाना, कुछ विशेष परिस्थितियों में संवेदनशीलता लगभग खत्म होने जैसी दिक्कतें होने लगती हैं।
पूर्व में टीबी की जांच थी जटिल :
एसीएमओ डॉ. नरेश कुमार ने बताया टीबी की समय पर जांच बहुत जरूरी है, ताकि जल्द इलाज शुरू किया जा सके। पूर्व में इसकी जांच जटिल थी। जिसमें मायक्रो बैक्टीरियम के सिर्फ एक हिस्से की जांच की जाती थी। जिसकी वजह से बहुत से मरीजों में टीबी का समय पर पता नहीं चल पाता था। पारंपरिक जीन एक्सपर्ट टेस्ट में सैंपल में ज्यादा माइको बैक्टीरिया की जरूरत होती है, जबकि जांच की नई प्रक्रिया में सैंपल के थोड़े से हिस्से से भी जांच की जा सकती है। फेफड़ों के टीबी के मरीजों में इसके दिमाग तक फैलने की आशंका ज्यादा रहती है। ऐसे मरीजों को समय पर इलाज या दवाओं का पूरा कोर्स लेना चाहिए। इन मरीजों में पहले से किसी रोग से पीड़ित, कमजोर इम्युनिटी या संक्रमण, मधुमेह, किडनी फेल्योर, चार साल से कम उम्र के बच्चे, शराब पीने वाले व जिन्हें पूर्व में टीबी से ग्रसित लोग शामिल हैं।

