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 सही जानकारी के अभाव में समय पर नहीं शुरू हुआ इलाज, ठीक होने के बाद लोगों को कर रहे हैं जागरूक


- सरकारी अस्पताल में इलाज शुरू हुआ तो बची जान, अब लोगों को भी दिलाते हैं भरोसा

- पांच साल तक परेशानी झेलने के बाद अब पूरी तरह से टीबी को मात दे चुके हैं सूर्या सिंह


बक्सर, 05 फरवरी | पहले के जमाने में इलाज के अभाव में टीबी (ट्यूबर क्लोसिस /यक्ष्मा) के कारण लोगों की जान तक चली जाती थी, पर आज ऐसा नहीं है। शहरी से लेकर ग्रामीण इलाके तक के लोग यह जानते हैं कि टीबी का इलाज संभव है। लेकिन, लोगों को यह भी समझना होगा कि टीबी का इलाज संभव तो है, लेकिन इसके लिए समय पर इसकी पहचान और उचित इलाज जरूरी है। दूसरी ओर, कई लोग इसके इलाज के लिए सरकारी के बजाए निजी अस्पताल में जाते हैं। जहां उनका इलाज तो चलता है, पर वह पूरी तरह से ठीक नहीं हो पाते हैं। वहीं, जब उनकी स्थिति पहले से और खराब हो जाती है, तब वह थक हार कर सरकारी अस्पताल में अपना इलाज शुरू करते हैं। कुछ ऐसी ही कहानी शहर के सोमेश्वर स्थान में रहने वाले सूर्या सिंह की है। वह जी पिछले पांच सालों से टीबी से परेशान थे। इसका मुख्य कारण यह था कि वह सरकारी के बजाए निजी चिकित्सकों पर भरोसा करते थे, जो उनको महंगा पड़ गया। लेकिन, टीबी से उबरने के बाद अब वह लोगों को टीबी समेत अन्य गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों पर भरोसा करने और इलाज कराने के लिए जागरूक करते हैं।

दोस्त से हुए थे संक्रमित, दो माह पता चला : 

सूर्या सिंह ने बताया वह टीबी से 2016 में अपने एक मित्र के सम्पर्क में आकर संक्रमित हुए थे। संक्रमण के दो माह तक उन्हें इसके संबंध में जानकारी नहीं थी। वह मेडिकल दुकान से दवा लेते, लेकिन खांसी जाने का नाम नहीं ले रही थी। इस बीच एक रात सोने के दौरान सीने में तेज दर्द हुआ। अगली सुबह वह बक्सर में चिकित्सक से मिले। जहां चिकित्सक ने टीबी के लक्षण बताए और अच्छे अस्पताल में इलाज का परामर्श दिया। उसके बाद सूर्यदेव इलाज के लिए बनारस गये। लेकिन, सरकारी के बजाए निजी अस्पताल में इलाज शुरू कराया। वहां 9 माह लगातर इलाज चला, फिर वह ठीक हो गए। मगर 2017 में दो माह बाद उनके सीने में वही दर्द उठा, तो वह बनारस जाकर चिकित्सक से मिले। चिकित्सक ने छह माह दवा चलाने को कहा और आश्वस्त किया कि इस बार वह पूरी तरह ठीक हो जाएंगे।

बाद में सरकारी अस्पताल में शुरू हुआ इलाज :

सूर्या सिंह ने बताया वर्ष 2017 में दवा का छह माह का कोर्स पूरा हुआ। उसके बाद उन्हें तकलीफ नहीं हुई। लेकिन, उचित इलाज के अभाव में 2019 में टीबी के लक्षण उन्हें फिर से महसूस होने लगे। इस बार वह बक्सर स्थित निजी चिकित्सक से दोबारा जाकर मिले। जहां चिकित्सक ने उनको काफी फटकार लगाई। उसके बाद उन्होंने सरकारी अस्पताल में इलाज कराने को कहा। जांच के क्रम में पाया गया सूर्यदेव में मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस (एमडीआर) के लक्षण है। जो टीबी का एक गंभीर स्टेज है। चिकित्सकों ने तत्काल उन्हें इलाज के लिए पटना रेफर कर दिया। जहां उनका विधिवत इलाज शुरू हुआ। लगभग एक साल तक लगातार इलाज चलाने के बाद पिछले पांच माह पूर्व वह टीबी से पूरी तरह उबर सके कें।

अब सभी को सरकारी अस्पताल में इलाज कराने के लिए करते हैं प्रेरित : 

सूर्या सिंह को पहले सरकारी अस्पतालों और सुविधाओं पर पूरा भरोसा नहीं था। लेकिन, जब निजी चिकित्सक के कारण परेशान हुए, तो पटना सरकारी अस्पताल में इलाज के बाद ही वह ठीक हो सके। ठीक होने के बाद अब वह अन्य लोगों को भी सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर विश्वास करने के लिए प्रेरित करते हैं। वहीं, सूर्या सिंह के मामले में अपर मुख्य चिकित्सा पदधिकारी सह सीडीओ डॉ. नरेश कुमार ने बताया लोगों में यही भ्रम रहता है कि सरकारी अस्पतालों में टीबी का इलाज बेहतर नहीं है। लेकिन, आज टीबी समेत अन्य गंभीर बीमारियों का इलाज सरकारी अस्पतालों में पूरी तरह संभव है। जहां अनुभवी चिकित्सकों के परामर्श और निगरानी में मरीज का इलाज किया जाता है। आज सरकारी अस्पतालों और डॉट्स सेंटरों में इसका नि:शुल्क इलाज होता है। अनियमित टीबी दवा का सेवन करना, बिना चिकित्सीय परामर्श के दवा दुकानों से टीबी का दवा लेना एवं टीबी के दवा खाने से पहले ड्रग सेंसटिविटी जांंच नहीं होने से भी एमडीआरटीबी होने की संभावना बढ़ जाती का ख़तरा बढ़ जाता है। इसलिए टीबी के लक्षण दिखने पर तुरंत अपने नजदीकी सरकारी अस्पताल में संपर्क करना आवश्यक है।

सही जानकारी के अभाव में समय पर नहीं शुरू हुआ इलाज, ठीक होने के बाद लोगों को कर रहे हैं जागरूक

 सही जानकारी के अभाव में समय पर नहीं शुरू हुआ इलाज, ठीक होने के बाद लोगों को कर रहे हैं जागरूक


- सरकारी अस्पताल में इलाज शुरू हुआ तो बची जान, अब लोगों को भी दिलाते हैं भरोसा

- पांच साल तक परेशानी झेलने के बाद अब पूरी तरह से टीबी को मात दे चुके हैं सूर्या सिंह


बक्सर, 05 फरवरी | पहले के जमाने में इलाज के अभाव में टीबी (ट्यूबर क्लोसिस /यक्ष्मा) के कारण लोगों की जान तक चली जाती थी, पर आज ऐसा नहीं है। शहरी से लेकर ग्रामीण इलाके तक के लोग यह जानते हैं कि टीबी का इलाज संभव है। लेकिन, लोगों को यह भी समझना होगा कि टीबी का इलाज संभव तो है, लेकिन इसके लिए समय पर इसकी पहचान और उचित इलाज जरूरी है। दूसरी ओर, कई लोग इसके इलाज के लिए सरकारी के बजाए निजी अस्पताल में जाते हैं। जहां उनका इलाज तो चलता है, पर वह पूरी तरह से ठीक नहीं हो पाते हैं। वहीं, जब उनकी स्थिति पहले से और खराब हो जाती है, तब वह थक हार कर सरकारी अस्पताल में अपना इलाज शुरू करते हैं। कुछ ऐसी ही कहानी शहर के सोमेश्वर स्थान में रहने वाले सूर्या सिंह की है। वह जी पिछले पांच सालों से टीबी से परेशान थे। इसका मुख्य कारण यह था कि वह सरकारी के बजाए निजी चिकित्सकों पर भरोसा करते थे, जो उनको महंगा पड़ गया। लेकिन, टीबी से उबरने के बाद अब वह लोगों को टीबी समेत अन्य गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों पर भरोसा करने और इलाज कराने के लिए जागरूक करते हैं।

दोस्त से हुए थे संक्रमित, दो माह पता चला : 

सूर्या सिंह ने बताया वह टीबी से 2016 में अपने एक मित्र के सम्पर्क में आकर संक्रमित हुए थे। संक्रमण के दो माह तक उन्हें इसके संबंध में जानकारी नहीं थी। वह मेडिकल दुकान से दवा लेते, लेकिन खांसी जाने का नाम नहीं ले रही थी। इस बीच एक रात सोने के दौरान सीने में तेज दर्द हुआ। अगली सुबह वह बक्सर में चिकित्सक से मिले। जहां चिकित्सक ने टीबी के लक्षण बताए और अच्छे अस्पताल में इलाज का परामर्श दिया। उसके बाद सूर्यदेव इलाज के लिए बनारस गये। लेकिन, सरकारी के बजाए निजी अस्पताल में इलाज शुरू कराया। वहां 9 माह लगातर इलाज चला, फिर वह ठीक हो गए। मगर 2017 में दो माह बाद उनके सीने में वही दर्द उठा, तो वह बनारस जाकर चिकित्सक से मिले। चिकित्सक ने छह माह दवा चलाने को कहा और आश्वस्त किया कि इस बार वह पूरी तरह ठीक हो जाएंगे।

बाद में सरकारी अस्पताल में शुरू हुआ इलाज :

सूर्या सिंह ने बताया वर्ष 2017 में दवा का छह माह का कोर्स पूरा हुआ। उसके बाद उन्हें तकलीफ नहीं हुई। लेकिन, उचित इलाज के अभाव में 2019 में टीबी के लक्षण उन्हें फिर से महसूस होने लगे। इस बार वह बक्सर स्थित निजी चिकित्सक से दोबारा जाकर मिले। जहां चिकित्सक ने उनको काफी फटकार लगाई। उसके बाद उन्होंने सरकारी अस्पताल में इलाज कराने को कहा। जांच के क्रम में पाया गया सूर्यदेव में मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस (एमडीआर) के लक्षण है। जो टीबी का एक गंभीर स्टेज है। चिकित्सकों ने तत्काल उन्हें इलाज के लिए पटना रेफर कर दिया। जहां उनका विधिवत इलाज शुरू हुआ। लगभग एक साल तक लगातार इलाज चलाने के बाद पिछले पांच माह पूर्व वह टीबी से पूरी तरह उबर सके कें।

अब सभी को सरकारी अस्पताल में इलाज कराने के लिए करते हैं प्रेरित : 

सूर्या सिंह को पहले सरकारी अस्पतालों और सुविधाओं पर पूरा भरोसा नहीं था। लेकिन, जब निजी चिकित्सक के कारण परेशान हुए, तो पटना सरकारी अस्पताल में इलाज के बाद ही वह ठीक हो सके। ठीक होने के बाद अब वह अन्य लोगों को भी सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर विश्वास करने के लिए प्रेरित करते हैं। वहीं, सूर्या सिंह के मामले में अपर मुख्य चिकित्सा पदधिकारी सह सीडीओ डॉ. नरेश कुमार ने बताया लोगों में यही भ्रम रहता है कि सरकारी अस्पतालों में टीबी का इलाज बेहतर नहीं है। लेकिन, आज टीबी समेत अन्य गंभीर बीमारियों का इलाज सरकारी अस्पतालों में पूरी तरह संभव है। जहां अनुभवी चिकित्सकों के परामर्श और निगरानी में मरीज का इलाज किया जाता है। आज सरकारी अस्पतालों और डॉट्स सेंटरों में इसका नि:शुल्क इलाज होता है। अनियमित टीबी दवा का सेवन करना, बिना चिकित्सीय परामर्श के दवा दुकानों से टीबी का दवा लेना एवं टीबी के दवा खाने से पहले ड्रग सेंसटिविटी जांंच नहीं होने से भी एमडीआरटीबी होने की संभावना बढ़ जाती का ख़तरा बढ़ जाता है। इसलिए टीबी के लक्षण दिखने पर तुरंत अपने नजदीकी सरकारी अस्पताल में संपर्क करना आवश्यक है।